क्या वाकई चमत्कार कर रही प्लाज्मा थेरपी?

रेमा नागराजन, नई दिल्ली भारत में कोरोना वायरस के खिलाफ जंग (fight against ) में को बड़े हथियार के तौर पर बताया जा रहा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस थेरपी के नतीजों को उत्साहवर्धक बताया है तो लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज ने भी इसे बेहद कारगर करार दिया है। कई प्राइवेट अस्पताल भी इस थेरपी को 'चमत्कारिक' बता रहे हैं। दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने चेताया है कि प्लाज्मा थेरपी (centre warns against use of plasma therapy as cure) का इलाज के तौर पर इस्तेमाल न हो, सिर्फ रिसर्च के लिए क्लीनिकल ट्रायल (plasma therapy only as clinical trial) के रूप में इस्तेमाल हो। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वाकई प्लाज्मा थेरपी इस महामारी के खिलाफ जंग में टर्निंग पॉइंट लाने वाला है या इसे बहुत ज्यादा प्रचारित किया गया है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि हकीकत क्या है। वाकई चमत्कारिक या बहुप्रचारित कोविड-19 मरीजों के इलाज में इस बीमारी से ठीक हो चुके लोगों के प्लाज्मा बाकी मरीजों के इलाज में कितने कारगर हो सकते हैं, इसकी जांच के लिए सिर्फ 3 क्लीनिकल ट्रायलों का रजिस्ट्रेशन हुआ है। हालांकि, कई प्राइवेट अस्पताल 'मरीजों पर दया' के आधार पर इसका इस्तेमाल कर रहे हैं और इसकी सफलता का बढ़चढ़कर बखान कर रहे हैं। सफलता के दावों पर विशेषज्ञ उठा रहे सवाल दूसरी तरफ कई विशेषज्ञों ने कहा है कि प्लाज्मा थेरपी की सफलता के इन दावों पर सवालिया निशान हैं क्योंकि अस्पतालों ने सिर्फ इस थेरपी का इस्तेमाल नहीं किया है, बल्कि उसके समानांतर मरीज पर स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल का भी पालन किया है। ऐसे में यह कहना बहुत मुश्किल है कि मरीज प्लाज्मा थेरपी से ठीक हुआ या उसके साथ चल रहे बाकी इलाज से। पढ़ें: वर्धा में महात्मा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के डॉक्टर एस. पी. कलांत्री कहते हैं, 'ये एक छोटे से हिस्सा भर हैं लेकिन विज्ञान नहीं। हो सकता है कि मरीज खुद से ठीक हुए हों, साथ में चल रहे इलाज की वजह से या यह भी हो सकता है कि वे प्लाज्मा थेरपी से ठीक हुए हों।' 452 मरीजों पर 6 महीने तक होगा क्लीनिकल ट्रायल कई प्राइवेट अस्पताल दावा कर रहे हैं कि उन्होंने प्लाज्मा थेरपी का इस्तेमाल किया है और यह बहुत कामयाब रहा है। इस वजह से कोरोना वायरस के मरीज भी इन्हीं अस्पतालों में इलाज कराना चाहते हैं। यही वजह है कि इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (ICMR) को बयान जारी कर कहना पड़ा कि प्लाज्मा थेरपी भी कई तरह की उभरते थेरपी में से एक है लेकिन ऐसे पर्याप्त सबूत नहीं हैं कि इसे रूटीन थेरपी माना जाए। ICMR ने अपने बयान में कहा है कि यह थेरपी कितनी कारगर और सुरक्षित है, इसका मूल्यांकन करने के लिए उसने कई केंद्रों पर इसके क्लीनिकल ट्रायल की शुरुआत की है। इस क्लीनिकल ट्रायल में 25 संस्थान शामिल हैं जो 6 महीनें तक 452 मरीजों पर इसका ट्रायल और रिसर्च करेंगे। थेरपी के इस्तेमाल से पहले इन बातों का आंकलन जरूरी दरअसल किसी संक्रमण से ठीक हो चुके मरीज के प्लाज्मा (खून का एक हिस्सा) में ऐंटबॉडीज पाए जाते हैं जिन्हें संक्रमण को खत्म करने के लिए हमारा शरीर प्रोड्यूस करता है। अब ठीक हो चुके मरीज का प्लाज्मा कितना कारगर है यह बहुत हद तक इस पर निर्भर करता है कि संक्रमण के खिलाफ ठीक हो चुके मरीज का इम्यून रिस्पॉन्स कितना तगड़ा था और उसके शरीर में कितनी मात्रा में ऐंटीबॉडीज प्रोड्यूस हुए थे। इसका आंकलन करने के बाद ही इस प्लाज्मा को दूसरे मरीज के शरीर में दिया जा सकता है ताकि वायरस के खिलाफ लड़ाई में उसकी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़े। सिर्फ इन 3 प्लाज्मा थेरपी का ट्रायल रजिस्टर्ड अब तक जिन 3 संस्थानों में प्लाज्मा थेरपी के क्लीनिकल ट्रायल का रजिस्ट्रेशन हुआ है वे हैं- पहला, दिल्ली में मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के साथ-साथ इंस्टिट्यूट फॉर लिवर ऐंड बिलियरी साइंसेज। दूसरा जयपुर का एसएमएस हॉस्पिटल और अहमदाबाद का एनएचएल म्यूनिसिपल मेडिकल कॉलेज, जहां आईसीएमआर फंडिंग कर रहा है। तीसरे क्लीनिकल ट्रायल का रजिस्ट्रेशन बेंगलुरु के एचसीजी ग्लोबल के लिए हुआ है जो एक कैंसर इलाज संस्थान है। यहां पर ट्रायल की फंडिंग स्टेमसेल कंपनी कर रही है लेकिन यहां अभी तक इसकी शुरुआत नहीं हुई है। एचसीजी ग्लोबल ने भी दिल्ली के मैक्स हॉस्पिटल की तरह 'दया के आधार पर' इस थेरपी का इस्तेमाल किया है और इसे कारगर बताया है। अभी क्लीनिकल ट्रायल होना बाकी है।


from India News: इंडिया न्यूज़, India News in Hindi, भारत समाचार, Bharat Samachar, Bharat News in Hindi https://ift.tt/2WbV1j3

Comments

Popular posts from this blog

20 साल बाद 'नाबालिग' हत्यारे की फांसी पर रोक?

इन्सेफलाइटिस : यूपी ने 2 ही साल में किया कमाल

CBI विवाद में डोभाल, केंद्रीय मंत्री का उछला नाम