लाखों का मुफ्त इलाज, जंग हारे '₹2 वाले डॉक्टर'
कुरनूल/हैदराबाद पिछले पांच दशकों से लाखों गरीब लोगों का मुफ्त में इलाज करने वाले आंध्र प्रदेश के डॉक्टर के.एम. इस्माइल हुसैन से खुद को नहीं बचा सके। '2 रुपये वाले डॉक्टर' के नाम से फेमस कुरनूल निवासी डॉक्टर इस्माइल ने लोगों को इस महामारी से बचाने की लड़ाई के दौरान ही दम तोड़ दिया। वह आंध्र के साथ ही पड़ोसी राज्यों तेलंगाना और कर्नाटक में काफी फेमस थे। अचानक तबीयत बिगड़ने और सांस लेने में तकलीफ की वजह से उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। के बाद उनमें कोरोना की पुष्टि हुई। उनके जनाजे में बड़ी संख्या में लोगों के आने की उम्मीद थी, लेकिन कोरोना की वजह से जारी गाइडलाइन्स के चलते घर के केवल 5 से 6 लोग ही शामिल रहे। डॉक्टर के घर के कुछ सदस्यों को भी कोरोना पॉजिटिव पाया गया है। इसके साथ ही हॉस्पिटल के स्टाफ को भी क्वारंटीन कर दिया गया है। 'दो रुपये वाले डॉक्टर'... कभी नहीं गरीबों से पैसा डॉक्टर इस्माइल ने ज्यादातर आबादी के गरीब होने की वजह से कभी भी परामर्श शुल्क जैसा कुछ चार्ज नहीं किया। हॉस्पिटल में जहां वह बैठते उसी के पास में एक बॉक्स रखा होता था। जिसको जितनी इच्छा होती, डाल देता था। पहले लोग उन्हें 2 रुपये देकर चले जाते। कई लोग इसे ही उनका शुल्क समझने लगे और वह 'दो रुपये वाले डॉक्टर' के तौर पर फेमस हो गए। बाद के दिनों में लोग 10 या 20 रुपये दे देते थे। जमातियों की पहचान के लिए सरकार ने ली मदद दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में आयोजित तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल होकर लौटे लोगों की पहचान के लिए सरकार ने डॉक्टर इस्माइल की मदद ली थी। वह 10 अप्रैल तक घर-घर जाकर जमातियों की पहचान के काम में लगे रहे। कई बार आए राजनीति जॉइन करने के ऑफर कुरनूल मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई करने के बाद वहीं के फैकल्टी मेंबर बने डॉक्टर इस्माइल के पास सैकड़ों किलोमीटर दूर से चलकर मरीज आते थे। कई राजनीतिक दल उनकी प्रसिद्धि को देखते हुए उन्हें राजनीति जॉइन करने का ऑफर देते रहते थे। यहां तक कि उन्हें मंत्री बनाए जाने का ऑफर भी मिला। उनके काफी पुराने दोस्त और बीजेपी से राज्यसभा सांसद टी जी वेंकटेश ने बताया कि डॉक्टर इस्माइल ने अपनी पूरी जिंदगी मानवता की सेवा में गुजार दी। आखिरी समय तक कोरोना से लोगों को बचाते रहे वेंकटेश ने बताया, 'यहां हिंदू और मुस्लिम दोनों ही अच्छी खासी संख्या में हैं। 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने के बाद उन्होंने क्षेत्र में सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए काफी प्रयास किए। वह अपने सभी मरीजों के साथ हमेशा एकसमान ही व्यवहार करते। चाहे मुस्लिम हो या फिर हिंदू। यहां तक कि मौत से कुछ दिनों पहले तक भी उन्होंने कोरोना वायरस के संक्रमण से सैकड़ों लोगों को बचाया।' 'कभी धर्म-जाति नहीं देखी, सबमें फेमस' डॉक्टर इस्माइल के एक अन्य दोस्त के सी कलकूरा ने बताया, 'यहां 40 प्रतिशत मुस्लिम आबादी होने के बावजूद वह कभी भी मुस्लिमों को डॉक्टर के तौर पर नहीं जाने गए। अन्य सभी धर्म और संप्रदाय के लोगों के बीच भी वह फेमस थे। उन्होंने कभी किसी मरीज का नाम नहीं पूछा। वह केवल उम्र और बीमारी के लक्षण ही पूछते थे।'
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