'लोग कोरोना से भी मर रहे हैं और भूख से भी'
पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना देश की पहली महिला ब्यूरोक्रेट हैं और पूरे विश्व में नृत्य प्रस्तुतियां दे चुकी हैं। वह गुरु, कोरियोग्राफर और लेखक भी हैं और अब तक 16 किताबें लिख चुकी हैं। विश्वविख्यात नर्तक पंडित बिरजू महाराज की वह शिष्या हैं। तीन साल की उम्र से थिरकना शुरू किया, जो आज भी जारी है। शोभना जी से संध्या रानी की बातचीत के प्रमुख अंश: कोरोना ने पूरे विश्व में एक भय का माहौल बना दिया है। क्या इससे आपके नृत्य पर भी असर पड़ा है? जी हां, इसकी वजह से हमारा प्रोग्राम नहीं हो पा रहा है। महीने में हमारे छह-सात प्रोग्राम हो जाते हैं। मेरे साथ जो साज बजाते हैं, मेकअप आर्टिस्ट हैं उन सबकी जीविका चली गई है। इसलिए हम सीनियर कलाकार उन्हें आर्थिक रूप से सपोर्ट कर रहे हैं। जो ऑर्गनाइजर कलाकारों को बुक करते थे, उनकी ही आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, वे हमें पैसे कहां से देंगे। लोग दोनों तरफ से मर रहे हैं- कोरोना से भी और भूख से भी। यह सबसे दुखद स्थिति है। इन दिनों टीवी पर जो नृत्य के कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं, क्या इससे बच्चों को आगे बढ़ने में मदद मिलेगी? मैं टीवी बहुत कम देखती हूं लेकिन मुझे वह डांस कम और जिमनास्टिक अधिक लगता है। छोटे-छोटे बच्चे प्राइज जरूर जीतते हैं, मगर उनकी जड़ें मजबूत नहीं होती हैं। इसके लिए माता-पिता भी जिम्मेदार होते हैं। आखिर इतनी जल्दी क्या है। बच्चे का बचपना तो रहने दो। उनकी भी साइकॉलजी होती है। जब वे नहीं जीतते हैं तो डिप्रेशन में चले जाते हैं। हालांकि बच्चे बहुत टेलैंटेड होते हैं। उन्हें अच्छी दिशा देनी चाहिए और क्लासिकल नृत्य सिखानी चाहिए। यह बात ऑर्गनाइजर्स को भी सोचना चाहिए कि वे बच्चों से जो करवा रहे हैं वह उनके उम्र के हिसाब से ही हो। छोटे बच्चे बड़ों के गाने पर जब बड़ों जैसा हाव-भाव देते हैं तो यह सब अच्छा नहीं लगता है। देश-विदेश में कोई ऐसी परफॉरमेंस, जो आज भी आपको भावुक कर देती हो? वैसे तो कई ऐसी जगह हैं। 1982 में सरकार की तरफ से परवीन सुल्ताना को और मुझे मॉस्को भेजा गया था। पूरा हॉल खचाखच भरा हुआ था और रूस के राष्ट्रपति भी वहां बैठे हुए थे। मेरा प्रोग्राम बहुत अच्छा हुआ। अचानक एक आदमी सिक्युरिटी को तोड़ते हुए स्टेज पर आया और मेरे पैरों पर फूल बिखेर दिए। यह एक अद्भुत नजारा था। हॉल में सभी खड़े होकर दस मिनट तक ताली बजाते रहे। यहां के अखबारों में भी छपा था और मेरी मां ने उस तस्वीर को बड़े ही जतन से काट कर रखा था। जब मैं यहां आई तो उन्होंने मुझे देखने के लिए दिया। अपनी समकालीन नृत्यांगनाओं में से किनसे आप अधिक प्रभावित हैं। बॉलिवुड में बेहतरीन नृत्यांगना किसे मानती हैं? जिनका भी क्लासिकल बेस होता है, वे बहुत अच्छा करती हैं। जैसे वैजयंती माला, वहीदा रहमान और माधुरी दीक्षित। क्योंकि उनका मूवमेंट बहुत अच्छा होता है। जो दो-तीन महीने के लिए सीखते हैं, उन्हें देखकर ही समझ में आ जाता। मेरी समकालीन नृत्यांगनाओं में तो अब कोई नहीं है। कला और संस्कृति को जीवन का अभिन्न हिस्सा कैसे बनाया जा सकता है? इसकी चर्चा तो सबसे पहले अपने घर में होनी चाहिए। नृत्य के माध्यम से हम अपनी संस्कृति और पौराणिक कथाओं को जानते हैं। इसके लिए मैं 30 साल से आर्टिकल्स लिख रही हूं कि नृत्य और संगीत को सब्जेक्ट के तौर पर स्कूलों में पढ़ाना चाहिए। हमारे यहां क्लासिकल संस्कृति और क्लासिकल लिटरेचर क्यों नहीं है, जबकि विदेश में बच्चों को शुरू से ही अपनी संस्कृति की शिक्षा दी जाती है। कोई पियानो बजा रहा है, कोई गिटार। उन्हें अपने देश के महान संगीतकार और कलाकारों की जीवनी पढ़ाई जाती है, जबकि हमारे यहां किसी बच्चे से पूछा जाए कि तानसेन कौन हैं तो वह नहीं बता पाएगा। पुस्तक लिखने की शुरुआत कब से हुई? 60 और 70 के दशक में नृत्य को हेय दृष्टि से देखा जाता था। लोग बाईजी कहते थे। कथक को मुगल दरबार से निकला हुआ नृत्य कहा जाता था जबकि इसका नाम संस्कृत में है। एक अमेरिकन ने लिखा कि कथक का जिक्र महाभारत में है। फिर बनारस में पुरातत्व विभाग ने कहा कि ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में कथक का जिक्र आया है। मुझे इसकी जानकारी मिली तब मैं इसके बारे में आर्टिकल लिखने लगी। उसके बाद मेरी पहली किताब आई।
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