वह रैली, जिसके बाद 1975 में लगी थी इमर्जेंसी

नई दिल्‍ली 25 जून 1975। आजाद भारत के इतिहास में लोकतंत्र के सबसे काले अध्‍याय की शुरुआत इसी दिन हुई। यही वो दिन था जब तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल (Emergency in India) लगाने का फैसला किया। अगले करीब दो साल तक देश ने दमन का एक नया रूप देखा जिसने ब्रिटिश राज के जख्‍म हरे कर दिए। आखिर इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाने का फैसला क्‍यों किया? इस सवाल के जवाब की शुरुआत भी जून 1975 से ही होती है। उस महीने में देश का घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला कि इतिहास की कई किताबें सिर्फ उन्‍हीं 30 दिनों के नाम हैं। आखिर उस महीने में ऐसा क्‍या हुआ था? वो फैसला जिसने रखी इमर्जेंसी की बुनियाद1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी से हारने वाले राज नारायण ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में केस दायर किया। इंदिरा पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप था। पहली बार कोई प्रधानमंत्री देश की अदालत के भीतर कटघरे में थी। 12 जून 1975 को जस्टिस जगमोहनलाल सिन्‍हा ने इंदिरा को दोषी करार दिया। यह फैसला भारतीय न्‍यायपालिका के इतिहास में मील का पत्‍थर माना जाता है। हालांकि 24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने शर्तो के साथ इस फैसले पर स्‍टे लगा दिया और इंदिरा को पीएम बने रहने की इजाजत दे दी मगर विपक्ष कुछ सुनने को तैयार नहीं था। इंदिरा गांधी के विरोध का ऐसा दौर शुरू हुआ जो 25 जून 1975 को अपने चरम पर पहुंच गया। रामलीला मैदान...जेपी और लाखों की भीड़कोर्ट के फैसले के बाद, 'लोकनायक' जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा से गद्दी छोड़ने को कहा। 25 जून 1975 की शाम को नई दिल्‍ली के रामलीला मैदान का नजारा देखने लायक था। उस जगह एक साथ इतने लोग कभी नहीं जुटे थे। यही वो जगह थी जब जेपी ने बुलंद आवाज में राष्‍ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर पंक्तियां कहीं, 'सिंहासन खाली करो क‍ि जनता आती है...' उस रैली को मोरारजी देसाई, अटल बिहार वाजपेयी, चंद्रशेखर जैसे नेताओं ने भी संबाधित किया। जेपी ने यहीं से इंदिरा से कुर्सी छोड़ने को कहा। जेपी ने सेना और पुलिस से असंवैधानिक और अनैतिक आदेश मानने से इनकार करने का आह्वान किया। रैली की गूंज ने इंदिरा को किया मजबूरवो रैली इतनी विशाल थी कि उसकी गूंज प्रधानमंत्री आवास तक पहुंच रही थी। यह रैली रात 9 बजे खत्‍म हुई, तबतक इंदिरा समझ चुकी थीं कि माहौल उनके खिलाफ हो चुका है। कोई और रास्‍ता न देख मजबूरी में उन्‍होंने आपातकाल लगाने का फैसला किया। आधी रात से थोड़ी देर पहले, राष्‍ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में आपतकाल की घोषणा की। अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई। विपक्ष के नेता हिरासत में ले लिए गए। 26 जून की सुबह इंदिरा ने रेडियो पर आपातकाल की जानकारी दी। 28 जून को अखबारों ने पन्‍ने खाली छोड़कर विरोध जताया। इसके बादा अगले 21 महीनों तक कई दमनकारी कदम उठाए गए। जनवरी 1977 में इंदिरा ने चुनाव कराने का फैसला किया। कांग्रेस बुरी तरह चुनाव हारी। जनता पार्टी का गठबंधन 345 सीटें जीतकर सत्‍ता में आ गया। आखिकार 21 मार्च, 1977 को आधिकारिक रूप से आपातकाल हटा लिया गया।


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